Sunday, 22 September 2013

समझो इशारे Part 1

समझो इशारे, रखो दिल का बेहतर खयाल आजकल दिल की बीमारियां तेजी से फैल रही हैं। 25-30 साल की उम्र में भी दिल की धड़कनों के दगा देने के मामले सामने आ रहे हैं। परेशानी की बात यह है कि इस उम्र में ध्यान न देने से बीमारी गंभीर हो जाती है और कई बार लाइलाज स्तर पर पहुंच जाती है। हम बता रहे हैं, दिल की आम बीमारियों, उन्हें पहचानने के तरीकों और जांच के बारे में,
जिससे वक्त रहते समस्या पर काबू पाया जा सके। पूरी जानकारी नीतू सिंह से: दिल की हर तरह की समस्या के लिए अलग इलाज की जरूरत होती है, मगर इनके लक्षण कई बार एक जैसे हो सकते हैं। ऐसे में यह जरूरी है कि आप समय-समय पर रुटीन जांच कराते रहें और कोई समस्या होने पर डॉक्टर से सलाह लें। दिल के अलग-अलग रोगों के लक्षण कोरोनरी आर्टरी डिजीज इसका सबसे आम लक्षण है एंजाइना या छाती में दर्द। एंजाइना को छाती में भारीपन, असामान्यता, दबाव, दर्द, जलन, ऐंठन या दर्द के अहसास के रूप में पहचाना जा सकता है। कई बार इसे अपच या हार्टबर्न समझने की गलती भी हो जाती है। एंजाइना कंधे, बाहों, गर्दन, गला, जबड़े या पीठ में भी महसूस की जा सकती है। बीमारी के दूसरे लक्षण ये हो सकते हैं : - छोटी-छोटी सांस आना। - पल्पिटेशन। - धड़कनों का तेज होना। - कमजोरी या चक्कर आना। - उल्टी आने का अहसास होना। - पसीना आना। हार्ट अटैक - सीने, बाहों, कुहनी या छाती की हड्डियों में असहजता, दबाव, भारीपन या दर्द का अहसास। - असहजता का पीठ, जबड़े, गले और बाहों तक फैलना। - पेट भरा होने, अपच या हार्टबर्न का अहसास होना। - पसीना, उल्टी, मितली या कमजोरी महसूस होना। - बहुत ज्यादा कमजोरी, घबराहट या सांस का रुक-रुककर आना। - दिल की धड़कनों का तेज या अनियमित होना। हार्ट अटैक के दौरान आमतौर पर लक्षण आधे घंटे तक या इससे ज्यादा समय तक रहते हैं और आराम करने या दवा खाने से आराम नहीं मिलता। लक्षणों की शुरुआत मामूली दर्द से होकर गंभीर दर्द तक पहुंच सकती है। कुछ लोगों में हार्ट अटैक का कोई लक्षण सामने नहीं आता, जिसे हम साइलेंट मायोकार्डियल इन्फ्रै क्शन यानी एमआई कहते हैं। ऐसा आमतौर पर उन मरीजों में होता है जो डायबीटीज से पीडि़त होते हैं। जिन लोगों को हार्ट अटैक की आशंका है, वे बिल्कुल देर न करें। फौरन आपातकालीन मदद लें, क्योंकि हार्ट अटैक में फौरन इलाज बेहद जरूरी है। इलाज जितनी जल्दी होगा, मरीज के पूरी तरह ठीक होने की संभावना उतनी ही ज्यादा होगी। एरिदमिया जब भी एरिदमिया यानी दिल की असामान्य धड़कनों के लक्षण सामने आते हैं, इन दिक्कतों का अहसास हो सकता है: - पल्पिटेशन (दिल की धड़कनों के चूकने का अहसास या तेज रफ्तार से सीने में धड़कन महसूस होना) - सीने में प्रहार जैसा महसूस होना। - चक्कर आना या सिर में हल्कापन महसूस होना। - बेहोशी। - छोटी-छोटी सांस आना। - सीने में असहज महसूस होना। - कमजोरी या थकावट। हार्ट वाल्व संबंधी बीमारी के लक्षण - पूरी सांस न आना, खासतौर से तब, जब आप अपनी सामान्य नियमित दिनचर्या कर रहे हों या बिस्तर पर सीधे लेटे हों। - कमजोरी या बेहोशी महसूस होना। - सीने में असहजता महसूस होना। कुछ काम करते वक्त या ठंडी हवा में बाहर निकलने पर छाती पर दबाव या भारीपन महसूस होना। - पल्पिटेशन (यह दिल की धड़कनों के तेजी से चलने, अनियमित धड़कन, धड़कनों के चूकने आदि के रूप में महसूस हो सकता है)। अगर वाल्व संबंधी बीमारी के चलते हार्ट फेल होता है तो ये लक्षण दिखाई देते हैं: -पैर या टखनों में सूजन। पेट में भी सूजन हो सकती है, जिसके चलते पेट फूला हुआ महसूस हो सकता है। -अचानक वजन बढऩा। एक दिन में दो से तीन पाउंड तक वजन बढ़ सकता है। - हार्ट वाल्व संबंधी बीमारी के लक्षण हमेशा स्थिति की गंभीरता से संबंधित नहीं होते। कई बार ऐसा भी होता है कि कोई लक्षण सामने नहीं आता, जबकि व्यक्ति को हार्ट वाल्व की गंभीर बीमारी होती है, जिसमें फौरन इलाज की जरूरत होती है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि लक्षण काफी गंभीर होते हैं, समस्या भी गंभीर होती है, मगर जांच में वाल्व संबंधी मामूली बीमारी का पता लगता है। हार्ट फेलियर - कुछ काम करते वक्त या आराम के दौरान छोटी-छोटी सांसें आना, खासतौर से तब जब आप बिस्तर पर सीधे लेटे हों। -खांसी होना जिसमें सफेद बलगम बन रहा हो। -अचानक वजन बढऩा (एक दिन में दो से तीन पाउंड तक वजन बढ़ सकता है)। -टखने, पैरों और पेट में सूजन। -बेहोशी। -कमजोरी और चक्कर आना। -मितली, पल्पिटेशन या छाती में दर्द। वाल्व संबंधी बीमारियों की तरह ही हार्ट फेलियर में भी लक्षण इस बात के संकेत नहीं होते हैं कि हार्ट कितना कमजोर है। हो सकता है कि मरीज में बहुत सारे लक्षण दिख रहे हों, मगर उसका दिल मामूली तौर पर डैमेज हुआ हो। ऐसा भी हो सकता है कि किसी में हार्ट के गंभीर रूप से डैमेज होने के बावजूद मामूली लक्षण दिख रहे हों। दिल संबंधी जन्मजात दोष ऐसे दोषों का जन्म से पहले, जन्म के फौरन बाद या बचपन में भी पता लगाया जा सकता है। कई बार बड़े होने तक इसका पता नहीं लग पाता। यह भी मुमकिन है कि समस्या का कोई लक्षण सामने आए ही नहीं। ऐसे मामलों में कई बार शारीरिक जांच में दिल की मंद ध्वनि से या ईकेजी या चेस्ट एक्सरे में इसका पता लग जाता है। जिन वयस्कों में जन्मजात दिल की बीमारी के लक्षण मौजूद होते हैं, उनमें ऐसा देखा जाता है: - जल्दी-जल्दी सांस लेना। - शारीरिक व्यायाम करने की सीमित क्षमता। - हार्ट फेलियर या वाल्व संबंधी बीमारी के लक्षण दिखना। - नवजात और बच्चों में जन्मजात हृदय संबंधी दोष। - साइनोसिस (त्वचा, उंगलियों के नाखूनों और होठों पर हल्का नीला रंग दिखाई देना) -तेज सांस लेना और भूख में कमी। -वजन ठीक ढंग से न बढऩा। - फेफड़ों में बार-बार इन्फेक्शन होना। - एक्सरसाइज करने में दिक्कत। जांच के तरीके कॉलेस्ट्रॉल किसी भी व्यक्ति के दिल की सेहत के मामले में कॉलेस्ट्रॉल सबसे अहम भूमिका निभाता है। ब्लड कॉलेस्ट्रॉल का ऊंचा स्तर कोरोनरी हार्ट डिजीज और स्ट्रोक का सबसे बड़ा कारण है। इसके लिए आपकी बांह से थोड़ा सा ब्लड लेकर लैब में टेस्ट किया जाता है। अगर डॉक्टर ने भूखे पेट यानी फास्टिंग कॉलेस्ट्रॉल टेस्ट की सलाह दी है, तो सैंपल देने से पहले 9 से 12 घंटे तक पानी के अलावा कुछ भी खाएं-पिएं नहीं। किसी भी तरह की दवा खाने से भी बचें। अगर आप खाली पेट जांच नहीं करा रहे हैं, तो रिपोर्ट में सिर्फ कुल कॉलेस्ट्रॉल और एचडीएल कॉलेस्ट्रॉल की वैल्यू को ही आधार माना जाएगा, क्योंकि आपके एलडीएल यानी बैड कॉलेस्ट्रॉल और टृाइग्लिसरॉइड के स्तर पर उन चीजों का प्रभाव होगा जो आपने टेस्ट से पहले खाया-पिया है। आपकी जांच रिपोर्ट कॉलेस्ट्रॉल को मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर (एमजी/डीएल) में दिखाएगी। डॉक्टर आपके कॉलेस्ट्रॉल स्तर को दूसरे रिस्क फैक्टर जैसे पारिवारिक इतिहास, स्मोकिंग और हाई बीपी आदि को भी ध्यान में रखते हुए आंकेंगे। अगर आपका कुल कॉलेस्ट्रॉल 200 एमजी/डीएल या इससे ज्यादा है या एचडीएल कॉलेस्ट्रॉल 40 एमजी/डीएल से कम है, तो आपके इलाज की लाइन तय करने के लिए आपके एलडीएल यानी बैड कॉलेस्ट्रॉल की जांच भी जरूरी होगी। ऐसे में अगर आपने पहला टेस्ट फास्टिंग में नहीं कराया है तो डॉक्टर आपको दोबारा कॉलेस्ट्रॉल टेस्ट कराने की सलाह दे सकते हैं। हर साल जांच हर साल कराएं कॉलेस्ट्रॉल की जांच अगर - कुल कॉलेस्ट्रॉल स्तर 200 एमजी/डीएल या इससे ज्यादा हो। - 45 साल से ज्यादा उम्र के पुरुष या 50 साल से ज्यादा उम्र की महिला हैं। - एचडीएल यानी गुड कॉलेस्ट्रॉल 40 एमजी/डीएल से कम हो। - दिल की बीमारियों या स्ट्रोक के दूसरे खतरों के दायरे में आते हों। ईकेजी ईकेजी का मतलब है इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम। इसे ईसीजी भी कहते हैं। ईकेजी कम समय में होने वाला, सुरक्षित, दर्दरहित और कम खर्चीला टेस्ट है, जिसे दिल की समस्या की आशंका में आमतौर पर किया जाता है। इस टेस्ट में मरीज की छाती, भुजाओं और पैरों की त्वचा पर छोटे इलेक्ट्रोड पैच लगाकर इनके जरिये दिल की इलेक्ट्रिक एक्टिविटी को रेकॉर्ड किया जाता है। इसे एक नियमित स्वास्थ्य जांच के तहत किया जा सकता है और दिल की बीमारी का पता लगाने के लिए भी। चेस्ट एक्सरे चेस्ट एक्सरे में दिल, फेफड़ों और छाती की हड्डियों की तस्वीर एक फिल्म पर उतारने के लिए बेहद मामूली मात्रा में रेडिएशन का इस्तेमाल किया जाता है। डॉक्टर चेस्ट एक्सरे का इस्तेमाल यह जानने के लिए कर सकते हैं : - छाती की संरचना (हड्डियों, हार्ट, फेफड़े) देखने के लिए। - पेसमेकर, डीफिब्रिलेटर जैसी डिवाइस लगाने से पहले आकलन करने के लिए। - अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान इलाज के लिए लगाए जाने वाले ट्यूब (कैथेटर, चेस्ट ट्यूब) मरीज को लगाए जा सकते हैं या नहीं, इस बात का आकलन करने के लिए। - फेफड़े और हृदय संबंधी बीमारियों का पता लगाने के लिए।

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